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Wednesday, 27 February 2019

क्या कोई सच्चे प्यार का सबूत दे सकता है?

  Dilip Yadav       Wednesday, 27 February 2019
जी हां दोस्तो आज मैं ये कहानी लिख कर इक वादे को तोड़ रहा हुं।
पहले ये बता आज किस बात पे झगड़ा मोल लिया? न हाल न चाल मैने जाते ही सवाल दाग दिया। प्रीतम ने धीमी दबि हुई आवाज मे पूछा तुझे कैसे पता मेरे झगड़े के बारे मे? मैने भी हस्ते हस्ते जवाब दिया, बेटा तुझको 8 सालो से जानता हु, जब भी तेरा फ़ोन बन्द हो मतलब साफ़ है। तु मनु से लड़ा हुआ है। बात खतम कर जैसे हि मैने प्रीत को ओर देखा , उसकी आखं मे आसूं उतर आये और रंग सुर्ख हो चुका था। लगता है इस बार मामला पेचिदा है मैने मन ही मन सोचा। अच्छा चल बता आज क्यु झगड़ा किया। मिल के कोइ हल निकालते है। ….… काश तु इस बार भी कुछ कर पाता कह्ते ही फ़ूट फ़ूट कर रोने लगा मानो कोई 3 साल क बच्चा गुब्बारे के लिये रो रहा हो बस आज तो मिलने पे हि चुप होगा।पिछले 5 सालो मे मैने इन दोनो को दिन मे 8-8 घन्टे लगातार बात करते देखा है। 8 घन्टो मे 3-3 घन्टे बहसते भी देखा है। गुस्से मे आके दिन मे 10 बार तो फ़ोन काट देता था। इन 5 सालो मे प्रीत क 7 वा फ़ोन है। जी हा 6 फ़ोन तो प्रीत के गुस्से मे बलिदान हो गये। मैने इन दोनो को प्यार के हर मौसम मे से गुजरते देखा है। प्यार के इतने भी रंग होते है मुझे तो इन दोनो से पता चला। सिवाय इस रंग के जो प्रीत ने आज दिखाया।
बीते सालो मे प्रीत ऐसा तो कभी नही रोया फ़िर आज क्युं? । मै अपने ही खयालों मे खुद से जवाब मांग रहा था। मैं इन यादों के भंवर मे पता नही कब तक फ़सा रहता शुकर है फ़ोन कि घन्टी बज गयी। अरे बाप रे! मा का फ़ोन देखते ही याद आया कि 10 बजे तो गैस एजेंसी पहुँचना है वर्ना सिलेंडर नही मिलेग और कल रविवार है। माँ तो जान निकाल लेगी। न चाहते हुए भी प्रीत को इस हाल मे छोड़ के जाना पड़ा । रोना बन्द कर और जाके मूह धो, कैसे बच्चों कि तरह बिलख रहा है। मै बस 10 मिन्ट मे आया मैने नाटकीय अन्दाज मे कहा और घर कि ओर भागा।
मैं छोटे भाई के साथ एजेंसी चल पड़ा। रास्ते भर मैं पुराने दिनो कि याद मे डूबा रहा। कैसे प्रीत कि मुलाकात मंजीत से फिजिक्स की ट्यूशन मे हुई। शुरूआती दिनो हम कुल 9 बच्चे (ट्यूशन )थे। मै , प्रीत अवि, मनु यानि मंजीत और उसकी सहेली, बाकी के 4 और भी थे जिनसे हमारी बिल्कुल भी नही बनती थी। अरे भाई बनती भी कैसे हमारी प्रेम कहानी मे अड़ग़ां जो थे। मैने प्रीत और अविनाश ने मिलके चारों को जैसे तैसे लड़ के झगड़ के और जाने कितने पापड़ बेले मगर ट्यूशन से भगा के ही दम लिया। एक से तो लड़ाई होते होते बची। अब अविनाश कब तक कबाब मे हड्डी बना रहता उसने भी ट्यूशन छोड़ दी।
बस बचे हम 4 । मनू की सहेली के साथ मेरा भी मामला सेट हो चुका था। कुल मिलाकर महौल रंगीन था। कुछ दिनो बाद हमारी नादान मैडम को सारा माजरा समझ आ गया कि बाकी बच्चे क्युं हट गये और नए बच्चे क्यु नही आ रहे। मरता क्या न करता हम ही चार तो थे ज्यादा कुछ कह भी नही सकती थी। टीचर पढ़ाती तो रहती मगर हम चार तो किसी और ही दुनिया मे गुम रहते। अरे कहा चले ज रहे हो एजेंसी आ गयी। पिछ्ली सीट पे बैठा छोटा भाई बोला। उसकी आवाज सुन मैं युं चौकां मानो नींद से उठा। “कहां खोये थे” भाई ने पोछा, कही नही मैने जवाब दिया। सिलेंडर घर छोड़ मै फ़ौरन प्रीत के घर पहुंचा और देखा जैसे मै उसे छोड़ के गया था वैसा ही बैठा था । बस इस बार कमरे मे अंधेरा था। आखें प्रीत कि रो रहीं थी और नम चार दीवारें हुई थी। मैं बगल कि कुर्सी पे बैठ गया। मेरे बैठने से पह्ले हि प्रीत कि जुबां नही दिल इस कदर बोलने लगा जैसे मेरे हि आने का
इन्तज़ार कर रहा हो। कुछ देर बोलता हि चला गया।……………………………उसके और मनु के बीच क्या हुआ, सारा माजरा सुन मेरे तो दिल दिमाग दोनो हि सुन्न हो गये समझ ही नही आ रहा थ कि कहु तो आखिर क्या। मेरी तो जुबान ही नही खुल रही थी कि। काश मैं बेचारे क दुख बांट पाता। बड़ी हिम्मत जुटा के बोला भूल ज उसे और उसकी करनी। भगवान क शुकर है कुछ देर हि सही तु वास्तव से रुबरू तो हुआ। अरे तु तो अपने आप को हि भूल बैठा था। अब सपनो से निकल और हकीकत को जी। pause…. प्रीत ने भी कठोर मन से हं मे सिर हिलाते हुए जवाब दिया और उसकी बांए गाल का आसूं टपक गया। और ऐसे बन ने लगा जैसे सब कुछ समन्या हो मगर कुछ भी तो समान्या नही था।
….…सुर्ख आंखे सब कुछ तो बता रही थी। खैर मैने भी उसकी समान्या दिखने वाली कोशिश को आगे बढ़ाते हुए पूछा “शाम को यूनिवर्सिटी रोड चलें क्या?” मन मार के हा मे सिर हिलाया।अरे हां तो कहना हि था आखिर पूछा किसने था।
जैसे तैसे 5 दिन बीत गये इन बीते दिनो मे न प्रीत ने बीती बात क रोना रोया और न मैने उसकी जुबान पे वो बात आने दी। हादसे के 7वें दिन.....आपने सही पढ़ा हादसा, जो प्रीत के साथ हुआ वो किसी हादसे से कम नहीं था फ़र्क सिर्फ़ इतना हि था कि चोट अंदरूनी थी। तो हाद्से के 7वें दिन प्रीत कानो मे हेडफोन लगाए छाती चौड़ी किये अपनी पुरानी चाल से चला आ रहा था। पास आते हि बोला आशीष मै दमाम जाने को तैयार हूं। पापा को भी बोल दिया और 21 मई कि टिकट भी हो गयी। लो आज ब्रहंमा जी क फ़ैसला बदल ही गया। ये ब्रहंमा क फ़ैसला ही तो था। वीज़ा तो पिछले 5 महीनो से आया था मगर इन जनाब के मूह पे तो एक ही बात थी “पापा ब्रहंमा जी अपना फ़ैसला बदल सकते हैं मगर मैं नही। मैने विदेश नही जाना। आये दिन इस बात को लेके घर मे महाभारत तो आम बात हो गयी थी। खैर देर आये दुरुस्त आये। आखिर घर मे खुशियां तो आयी। उसकी दमाम जाने की बात सुन मैने उसे गले से लगा लिया। यह खबर सुन मैं इतना खुश था की उसके दूर जाने कि बात मेरे जहन मे ही नही आयी। चमकती आंखो से बस इतना ही बोला “ बेटा जाने के 90 दिनो के अंदर एक अच्छा स फ़ोन आना चाहिये। अरे 90 क्यों 45 दिनो मे हि भेज दूंगा पहले जाने तो दे कह कर उसने फ़िर से गले लगा लिया।
फ्लाइट 20 मई रात की थी मगर 18 को ही मैं प्रीत और इन सब बातो से अन्जान हरप्रीत (सँघा) भी दिल्ली एयरपोर्ट के लिये हामरे साथ चल पड़ा। पूरा रास्ता हमने हैरी की टांग खीचते बिता दिया।मैने अभी फ़ोन निकाला ही था कि प्रीत बोला तेरा फ़ोन तो मैं गटर मे डाल दूंगा हर दूसरे मिन्ट उसी मे घुस जाता है प्रीत चहरे पे बनावटी गुस्सा लाते हुए बोला। मैने मैसेज क रिप्लाई किया और फ़ोन जेब मे डाल लिया। सारा दिन हमने इंडिया गेट रोज टेम्पल और बाग़ घूंमते हुए बिताए। इस बीच प्रीत कयी बार उदासी क शिकार जरूर हुआ। । उसने हम दोनो से उदासी छुपाने के बेजोड़ कोशिश कि मगर तीनो ही बार तो मुझे पता चल गया उसकी उदासी का कभी कभी ऐसा होता है न कि जब आप किसी चीज को भूलने की कोशिश कर रहे हो तो बार बार कोइ कोइ उसकी याद दिला ही देता है। जब हमने नेहरू चौंक आइस क्रीम पार्लर के बगल वाली मशहूर पहाड़ ग़ंज के भटूरे खाने की बात कि तो उसने इकद्म से मना कर दिया। मै इक दम से भांप गया कि दांई ओर वाली दुकान क नाम मनु कास्मेटिक है इसी लिये ये मना कर रहा है तो मैने भी बात गोल कर दि। कैसे मूह उतर गया था बेचारे का। दूसरी बार जब प्रीत ने किसी फिजिक्स टूशन का ऐडवर्टिसमेंट देखी तो आसू आते आते बचे थे। मै हर बार ही उसकी उदासी और उसका कारन समझ जाता। “अरे खाते समय तो फ़ोन अन्दर रख ले कम से कम। आज क दिन तो बिना फ़ोन के गुजार ले” इस बार हैरी बोला। लो अब ऐरे गैरे नथ्थु खैरे कि भी बात सुन नी पड़ेगी मैने महौल को गमगीन से रंगीन मे बदलते हुए कहा। और झट से फ़ोन बन्द कर दिया। धीरे धीरे वो गमज़दा वक्त नज्दीक आ गया। फ्लाइट टेक ऑफ को सिर्फ़ 2 ही घंटे बचे थे।
हम टर्मिनल 3 की ओर चल पड़े। और कुछ ही देर मे बिलकुल ठीक सामने थे। जैसे तैसे हमने अपने जज्बातो को काबू रखते हुए , खयाल रखना खाना समय पे खाना आदी जैसी बातें कहिं गले मिले और वो जाने लगा। और हम चारो बाय बाय करने लगे। शायद आपने गौर नहीं किया मैंने कहा हम चारो । मैं प्रीत हैरी और ……मनु। वो बेचारी भी प्रीत और हैरी कि नजरों से बच कर बेवफ़ा का तगमा पहने बुक शोप की ओट मे प्रीत को अल्विदा कह रही थी। जब प्रीत ओझल हो गया तो मैने हैरी से कहा तु यहीं बैग के पास रुक मै वाशरूम होकर आया और पहुचं गया सीधा उस बेचारी के पास जो अपना सब कुछ खो चुकी थी ।मुझे देखते ही तुरन्त मेरे कन्धो क सहारा लिये रोने लगी । मानो उसके आन्सू भी मेरे कन्धे क ही इन्त्ज़ार कर रहे हो। मैने मनु को चुप कराते हुए कहा अगर आज प्रीत अपनी दुनिया संवारने विदेश गया है तो सिर्फ़ तुम्हारे कराण्। उसकी तो लाइफ सेट हो गयी। और मैने दबी हुई आवाज मे कहा
“मैं कर्ज़दार हु तुम्हरी इस बेवफ़ाई का जिसके कारण मेरे भाई जैसे दोस्त की जिन्द्गी संवर गयी।
“मैं कर्ज़दार हु तुम्हारे इस त्याग का जो तुमने प्रीत के लिये दिया।
अच्चा तुम जल्दी से अपने होटल चलि जाओ रात बहुत हो गई कह कर जैसे ही मै चलने लगा मनू बोली।आशीष रुको! वादा करो ! तुम ये राज़ किसी से जाहिर नही करोगे,। मेरा दिल तो कर रहा था अभी जाके सब कुछ प्रीत को सच सच कह दु कि मनु ने ऐसा कुछ नही किया जो तुमने सुना। वो सब झूठ है,फ़रेब है। जब तक मनु और तुम एक साथ रहते तुम दमाम जाने को कभी राजी नही होते। मनु क प्यार तुम्हरे कामयाबी कि रस्ते मे जंजीर बन रहा थ इस लिये इस बेचारी ने य जहर पिया। जाके दूर कर दू सारी गलतफ़ैमीया। मगर अफ़सोस मै वादे के सिवा और कुछ नही कर सका। जैसे ही मैं मुड़ने लगा और वो फ़िर बोली।
वो बोली, पिछली 14 फरवरी को हम दोनो ने लोटस टेम्पल घूमने क वादा किया था। हाथों मे हाथ डाल के न सही वादा तो पूरा हुआ।
मैं कर्ज़दार रहूँगी तुम्हारा उसे लोटस टेम्पल लाने के लिये.
मैं कर्ज़दार रहूँगी तुम्हारा तुम्हारे हर किये गये मैसेज का जिसके कारन मैं पल पल प्रीत को देख सकी।
शायद और देर अपने आंसू न रोक पाती वो इकदम से मुड़ी चली गयी।
बस इतनी सी थी सच्चे प्यार की कहानी। मंजीत ने ये बता दिया की प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं।और रही बात सबूत की तो मंजीत का त्याग ही प्यार का सबूत है
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