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Saturday, 23 February 2019

स्पेस टाइम को मोड़े जाने का क्या अर्थ है?

  Dilip Yadav       Saturday, 23 February 2019

आइंस्टीन की थ्योरी के मुताबिक स्पेस टाइम एक कपडे की तरह है। जब कोई वास्तु उसपर आती है तो उसका भार इस कपडे को मोड़ देता है , ठीक उसी प्रकार जैसे एक गेंद को स्पॉट कपडे पर रखने से वह मुड़ जाता है। स्पेस टाइम का यह कर्व हम गुरुत्वाकर्षण के रूप में देखते हैं।
वस्तु जितनी भारी होगी, उतना ही वह स्पेस टाइम को कर्व करेगी। जितनी स्पेस टाइम कर्व होगा उतनी ही ज़्यादा गुरुत्वाकर्षण शक्ति होगी वहाँ। यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति आस पास की वस्तुओं को अपनी और आकर्षित करेगी।
इस कर्व की वजह से धरती चीज़ों को अपनी तरफ आकर्षित करती है।
टाइम के कर्व होने का मतलब होता है की वहां समय की गति धीमी हो जाती है। यह हिस्सा समझना थोड़ा जटिल है। समय के धीमे होना का कारण है की प्रकाश की गति कांस्टेंट रहती है हर जगह। इसका अर्थ है कि एक सेकंड का ठहराव उतना होगा जितना प्रकाश को ३० क्रोड़ किलोमीटर तय करने के लिए लगेगा। भरी वास्तु के कहीं होने की वजह से वहां का स्पेस कर्व हो जाता है, इसलिए प्रकाश को वोही दूरी तय करने के लिए ज़्यादा समय लगेगा। इस वजह से वहां समय की रफ़्तार बाकी जगह के मुकाबले धीमी हो जाती है। वहां का एक सेकंड दूसरी जगह के २-३ सेकंड जितना लम्बा हो सकता है।
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